नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन और इससे जुड़े नए दंडात्मक प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। यह याचिका कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा ने दाखिल की है। इसमें Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता तथा गृह मंत्रालय की ओर से जारी वंदे मातरम् संबंधी निर्देशों को चुनौती दी गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह फिलहाल यह तय करने के लिए नहीं जा रही है कि वंदे मातरम् के आधिकारिक गायन में दो अंतरे होने चाहिए या सभी छह। अदालत का मुख्य ध्यान इस सवाल पर है कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर वंदे मातरम् गाने से इनकार करता है, तो क्या उसे आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने किस मुद्दे पर जताई रुचि?
सुनवाई के दौरान पीठ ने Bijoe Emmanuel v. State of Kerala मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का उल्लेख किया। वर्ष 1986 के इस मामले में अदालत ने धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान नहीं गाने वाले छात्रों के अधिकारों पर विचार किया था।
मौजूदा सुनवाई में अदालत की ओर से यह संकेत दिया गया कि राष्ट्रीय गीत के संबंध में सरकार द्वारा निर्धारित व्यवस्था और किसी व्यक्ति पर आपराधिक दंड लगाने के सवाल को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय प्रतीक या राष्ट्रीय गीत के रूप और आधिकारिक व्यवस्था से जुड़े निर्णय सरकार और संसद के क्षेत्र में आते हैं। हालांकि, यदि किसी व्यक्ति को धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर गीत नहीं गाने के कारण आपराधिक परिणाम भुगतने पड़ते हैं, तो उस पहलू की संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।
टी.एम. कृष्णा की याचिका में क्या चुनौती दी गई है?
टी.एम. कृष्णा की याचिका में मुख्य आपत्ति वंदे मातरम् के अंतिम चार अंतरों को लेकर है। याचिका में कहा गया है कि इन अंतरों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे हिंदू धार्मिक संदर्भ आते हैं।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि इन अंतरों को किसी व्यक्ति के लिए अनिवार्य रूप से गाना आवश्यक किया जाता है, तो यह उसके अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(a), 21 और 25(1) का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि धार्मिक संदर्भ वाले गीत के पूरे संस्करण को अनिवार्य रूप से गाने की व्यवस्था व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार की कसौटी पर कैसे परखी जाएगी।
2026 के संशोधन पर भी सवाल
याचिका का एक प्रमुख हिस्सा Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 में किए गए बदलाव से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, संशोधित कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर National Anthem या National Song के गायन को रोकता है अथवा ऐसे गायन में लगी सभा में व्यवधान पैदा करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है और दोष सिद्ध होने पर तीन वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
याचिका में इस प्रावधान की भाषा और उसके संभावित दायरे पर सवाल उठाए गए हैं। विशेष रूप से “disruption” या व्यवधान जैसे शब्दों को लेकर यह तर्क दिया गया है कि उनकी व्यापक व्याख्या से शांतिपूर्ण असहमति, अकादमिक अध्ययन, कला या ऐतिहासिक चर्चा जैसी गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई का केंद्र इस बात पर है कि किसी व्यक्ति द्वारा सम्मानपूर्वक गीत न गाने और जानबूझकर किसी कार्यक्रम में व्यवधान डालने के बीच कानूनी अंतर कैसे निर्धारित किया जाए।
गृह मंत्रालय के निर्देश भी चुनौती के दायरे में
याचिका में गृह मंत्रालय की ओर से 2026 में जारी उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों के गायन को लेकर प्रोटोकॉल निर्धारित किया गया था।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन प्रशासनिक निर्देशों को नए आपराधिक प्रावधान के साथ पढ़ने पर ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों का गायन व्यावहारिक रूप से अनिवार्य हो जाए।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि संबंधित Office Memorandum को राजपत्रित कानून का दर्जा नहीं दिया गया है। इसलिए उसके आधार पर नागरिकों पर ऐसी बाध्यता या दंडात्मक परिणाम लागू करने का सवाल भी संवैधानिक जांच के दायरे में आना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत के छह या दो अंतरों पर क्या कहा?
सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यह तय करने से परहेज किया कि वंदे मातरम् को आधिकारिक रूप से दो अंतरों तक सीमित किया जाना चाहिए या सभी छह अंतरों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
पीठ ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय प्रतीकों और उनसे जुड़ी आधिकारिक व्यवस्था का निर्धारण निर्वाचित सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत का परीक्षण मुख्य रूप से उस स्थिति पर केंद्रित रहेगा जिसमें किसी व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के कारण गीत न गाने पर आपराधिक दंड का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए मौजूदा सुनवाई को वंदे मातरम् के दो बनाम छह अंतरों पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
मार्च 2026 की याचिका से कैसे अलग है मामला?
इस मामले को समझने के लिए मार्च 2026 की एक पिछली याचिका महत्वपूर्ण है। मुहम्मद सईद नूरी ने जनवरी 2026 में गृह मंत्रालय की ओर से जारी वंदे मातरम् संबंधी निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
25 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि संबंधित निर्देश अनिवार्य नहीं थे और उनमें गीत न गाने पर कोई दंडात्मक परिणाम निर्धारित नहीं किया गया था। पीठ ने उस याचिका को समय से पहले उठाई गई चिंता माना था।
मौजूदा याचिका में टी.एम. कृष्णा की ओर से यही अंतर महत्वपूर्ण बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि 2026 के संशोधन के बाद स्थिति बदल गई है क्योंकि अब National Song से जुड़े कुछ कृत्यों के लिए आपराधिक दंड का प्रावधान कानून में शामिल किया गया है।
इसलिए उनका तर्क है कि मार्च में मौजूद कानूनी स्थिति और अब चुनौती दिए जा रहे संशोधित कानून के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी पर विवाद
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर आपत्ति जताई। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के संबंध में टिप्पणी करते हुए कानून बनाने की प्रक्रिया के संदर्भ में “Naxalite” शब्द का इस्तेमाल किया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने इस टिप्पणी पर आपत्ति जताई और इसे वापस लेने की मांग की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया और अपनी बात पर कायम रहे।
यह बहस मुख्य संवैधानिक प्रश्न से अलग थी, लेकिन सुनवाई के दौरान इस पर भी अदालत का ध्यान गया।
याचिका में 1937 के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख
टी.एम. कृष्णा की याचिका में वंदे मातरम् के ऐतिहासिक इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार, 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के गायन को पहले दो अंतरों तक सीमित रखने का निर्णय लिया था।
याचिका में दावा किया गया है कि यह निर्णय मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद लिया गया और राजेंद्र प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू तथा रवींद्रनाथ टैगोर सहित कई प्रमुख नेताओं ने इस व्यवस्था का समर्थन किया था।
याचिका में संविधान सभा के 24 जनवरी 1950 के निर्णय का भी उल्लेख है, जब जन गण मन को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया गया था। याचिकाकर्ता ने यह तर्क रखा है कि संविधान सभा द्वारा वंदे मातरम् को उसी प्रकार औपचारिक रूप से “National Song” घोषित किए जाने की कोई समान प्रक्रिया नहीं हुई थी।
इन ऐतिहासिक दावों की भूमिका मौजूदा मामले में इस सवाल से जुड़ी है कि वंदे मातरम् की आधिकारिक स्थिति और उसके निर्धारित संस्करण की कानूनी सीमा को किस आधार पर समझा जाए।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब मांगा है। इसके बाद अदालत मामले में उठाए गए संवैधानिक सवालों पर आगे सुनवाई करेगी।
फिलहाल अदालत ने वंदे मातरम् के छह अंतरों को अनिवार्य या गैर-अनिवार्य घोषित करने वाला कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसी तरह, 2026 के संशोधन की संवैधानिक वैधता पर भी अंतिम निर्णय अभी बाकी है।
मौजूदा सुनवाई का प्रमुख संवैधानिक प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय गीत से जुड़े कानूनी संरक्षण और किसी नागरिक की अंतरात्मा, धार्मिक स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस तरह निर्धारित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का अगला रुख केंद्र सरकार के जवाब और दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलों के बाद स्पष्ट होगा। तब तक इस मामले को एक लंबित संवैधानिक चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि वंदे मातरम् के गायन को लेकर अंतिम न्यायिक निर्णय के रूप में।
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