झांसी। उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज से सामने आई एक तस्वीर ने व्यवस्था और इंसानियत दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तस्वीर में एक छोटी बच्ची अपनी मां के शव को ठेले पर लेकर खड़ी दिखाई दे रही है, जबकि पास ही उसका पिता बेबसी की हालत में बैठा नजर आ रहा है। दावा किया जा रहा है कि आर्थिक तंगी और शव वाहन की व्यवस्था नहीं होने के कारण परिवार को अस्पताल की पार्किंग में काफी समय तक इंतजार करना पड़ा।
बताया जा रहा है कि मध्य प्रदेश के ओरछा निवासी राहुल आदिवासी अपनी पत्नी रामवती का इलाज कराने के लिए झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने रामवती को मृत घोषित कर दिया। इसके बाद परिवार के सामने सबसे बड़ी मुश्किल पत्नी के शव को घर ले जाने की खड़ी हो गई।
शव वाहन का इंतजार, ठेले के सहारे पत्नी का शव
आरोप है कि शव को घर ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं हो सकी। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण परिवार के पास निजी वाहन करने के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं थे। इसी मजबूरी में शव को एक ठेले पर रख दिया गया।
सबसे ज्यादा विचलित करने वाला दृश्य उस समय सामने आया, जब करीब 8 साल की मासूम बेटी अपनी मां के शव के पास खड़ी दिखाई दी। बच्ची शायद यह समझने की कोशिश कर रही थी कि आखिर उसकी मां के साथ क्या हुआ और अब उन्हें घर कब ले जाया जाएगा।
पास ही पिता भी बेबस नजर आए। एक तरफ पत्नी को खोने का दुख और दूसरी तरफ अंतिम संस्कार के लिए शव को घर ले जाने की चिंता—इस परिवार के सामने मानो दुख का पहाड़ टूट पड़ा था।
मासूम बेटी की आंखों में सवाल
तस्वीर में बच्ची का अपनी मां के शव के पास खड़ा होना हर किसी को भावुक कर रहा है। जिस उम्र में बच्चों को स्कूल, खेल और परिवार के साथ खुशियों के बारे में सोचना चाहिए, उस उम्र में वह अपनी मां के शव के पास खड़ी होकर परिस्थितियों का सामना कर रही थी।
यह दृश्य केवल एक परिवार की मजबूरी नहीं दिखाता, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि अस्पताल में किसी गरीब परिवार के सामने ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई।
गरीबी के आगे बेबस दिखा परिवार
किसी अपने को खोने का दर्द पहले ही असहनीय होता है। ऐसे में अगर अंतिम सफर के लिए भी परिवार को साधन न मिले, तो उसकी पीड़ा का अंदाजा लगाना मुश्किल है। राहुल और उनकी बेटी के लिए वह वक्त शायद जिंदगी का सबसे कठिन समय रहा होगा।
इस घटना से जुड़ा वीडियो और तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों में भी नाराजगी और संवेदना देखने को मिल रही है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि अस्पतालों में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के परिजनों के लिए शव वाहन जैसी मूलभूत सुविधा तत्काल उपलब्ध कराने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
एक मां की मौत के बाद उसकी छोटी बेटी का शव के पास खड़ा यह दृश्य शायद यही सवाल पूछ रहा है—क्या अंतिम सफर के लिए भी किसी गरीब को अपनी मजबूरी साबित करनी पड़ेगी?