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जौनपुर में स्वतंत्रता संग्राम के अदम्य सेनानी पं. सूर्यनाथ के नाम से कांपती थी अंग्रेजी हुकूमत

जौनपुर, 09 अगस्त : उत्तरप्रदेश में जौनपुर जिले के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास यदि किसी नाम के बिना अधूरा माना जाएगा, तो वह नाम है स्वर्गीय पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय। आजादी की लड़ाई में उनके साहस, संघर्ष और संगठन क्षमता ने उन्हें जनपद के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारियों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया।
स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने अंतिम सांस तक समाज के दबे-कुचले, शोषित और गरीब तबके की आवाज बनकर जनसेवा का व्रत निभाया। भारत छोड़ो आंदोलन 09 अगस्त 1942 में उपाध्याय जी ने अपने कई साथियों के साथ जिले के बक्सा थाने पर तिरंगा फ़हरा दिया था और अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार किया। वह दो ढाई महीने बाद जेल से रिहा हुए। अपने ओजस्वी भाषणों, जुझारू तेवर और तेज-तर्रार नेतृत्व के कारण वह वर्षों तक जौनपुर में कांग्रेस की राजनीति के केंद्र बिंदु बने रहे। गरीबों के हक की लड़ाई लड़ने के कारण लोग उन्हें प्रेम से “गरीबों का मसीहा” कहा करते थे।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय का जन्म 16 जनवरी 1918 (बुधवार) को सिकरारा थाना क्षेत्र के देहचुरी गांव में हुआ। मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने अपने रक्त से पत्र लिखकर शहीद भगत सिंह के संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की सदस्यता ग्रहण की। वर्ष 1938 में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी निभाई। उनके बढ़ते प्रभाव से चिंतित अंग्रेजी सरकार ने 18 मार्च 1941 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। करीब नौ महीने की कठोर जेल यात्रा भी उनके इरादों को डिगा नहीं सकी।
जौनपुर और चुनार जेल में रहते हुए उन्होंने क्रांतिकारियों का एक मजबूत संगठन तैयार किया, जिसने वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई अपने साथियों के साथ निडर होकर नौ अगस्त 1942 को बक्शा थाने पर तिरंगा झंडा फहरा दिया था।
बताया जाता है कि बरईपार-सिरसी के शिव मंदिर में जनपद के क्रांतिकारियों की ऐतिहासिक गुप्त बैठक हुई, जहां बंदूकों और पारंपरिक हथियारों की गूंज के बीच पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय को जिले का कमांडर चुना गया। उनके नेतृत्व में लगभग 500 युवा क्रांतिकारी और करीब 150 आधुनिक हथियारों से लैस जत्था अंग्रेजी शासन को चुनौती देने के लिए निकल पड़ा। इस क्रांतिकारी दल का इतना प्रभाव था कि अंग्रेजी पुलिस कई स्थानों पर सीधी मुठभेड़ से बचती थी।
तत्कालीन कमिश्नर नेदरसोल ने उन्हें पकड़ने के लिए कई अभियान चलाए, लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगी। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला देने वाली कई साहसिक कार्रवाइयां कीं। मछलीशहर तहसील पर धावा, सुजानगंज थाने पर कब्जा, सिकरारा स्थित राजा बनारस की छावनी को तहस-नहस करना, तथा कई सरकारी गोदामों और डाकघरों पर कार्रवाई जैसी घटनाओं ने अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अंग्रेज सरकार ने पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय और उनके साथियों को देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया तथा उनकी गिरफ्तारी पर 10 हजार रुपये का इनाम घोषित किया।
16 अक्टूबर 1942 को कुल्हनामऊ डाकघर की घटना के बाद कुछ देशद्रोहियों की मुखबिरी के चलते पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय अपने साथियों बैजनाथ सिंह, दुखरन मौर्य, उदरेज सिंह, शिवब्रत सिंह और दयाशंकर के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने उनके घरों में आग लगा दी। 30 दिसंबर 1942 को उन्हें सात वर्ष के कठोर कारावास और 100 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई गई। इसके बाद मड़ियाहूं के एक अन्य मामले में नौ जनवरी 1943 को दो वर्ष का अतिरिक्त कारावास मिला। विभिन्न मामलों को मिलाकर उन्हें कुल 24 वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया।
फरवरी 1943 में उन्हें बनारस सेंट्रल जेल भेजा गया, जहां उन्होंने 15 दिनों तक आमरण अनशन किया। बाद में हरदोई ले जाते समय छह अप्रैल 1943 को रेलवे स्टेशन पर “भारत माता की जय” के नारे लगाने को लेकर पुलिस से उनकी तीखी नोकझोंक हुई। आरोप है कि अपमानजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक जेटली पर हमला कर दिया, जिसके बाद उनके खिलाफ डीआईआर की धारा 38 के तहत एक और मुकदमा दर्ज किया गया। हरदोई जेल में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। हथकड़ी-बेड़ियों में जकड़े होने के बावजूद उन्होंने जेल की सलाखें काटकर भागने का प्रयास किया, लेकिन अंतिम दीवार पर पकड़े गए। इसके बाद उन्हें इतनी निर्ममता से पीटा गया कि उनका पूरा शरीर लहूलुहान हो गया। साथी बंदियों ने उन्हें मृत समझ लिया और कई जेलों में उनके नाम पर शोक सभाएं तक आयोजित हो गईं। किंतु अदम्य जीवट के धनी पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय ने मौत को भी मात दी और 12 दिन बाद उन्हें होश आया।।
पंडित सूर्यनाथ उपाध्याय का जीवन केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की गाथा नहीं, बल्कि साहस, त्याग, संगठन शक्ति और राष्ट्रभक्ति का ऐसा स्वर्णिम अध्याय है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

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