Headlines

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए जरूरी नहीं पूर्व मंजूरी, धारा 197 पर दी अहम व्यवस्था

नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026 | Baghpat Wire

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि FIR दर्ज करने और पुलिस जांच शुरू करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी (Sanction) जरूरी नहीं है, यदि मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया अपराध का संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले की है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने Sri Anumandala Rajesh Reddy vs. State of Karnataka & Anr. मामले में 24 अगस्त 2026 को यह फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें सरकारी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को पूर्व मंजूरी नहीं होने के आधार पर निरस्त कर दिया गया था। 

FIR दर्ज करने से पहले मंजूरी जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी की आवश्यकता उस समय होती है, जब अदालत किसी अपराध का संज्ञान लेने जा रही हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि FIR दर्ज करने या पुलिस जांच शुरू करने से पहले ही मंजूरी लेना अनिवार्य हो।

अदालत के अनुसार, धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा FIR दर्ज करने और जांच का आदेश देना एक प्री-कॉग्निजेंस (Pre-Cognizance) प्रक्रिया है। इसे अपराध का संज्ञान लेना नहीं माना जा सकता।

पीठ ने कहा कि FIR दर्ज करने, जांच करने और पुलिस रिपोर्ट दाखिल करने की प्रक्रिया के बाद ही अदालत द्वारा संज्ञान लेने का सवाल उठता है। 

कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

यह मामला कर्नाटक के कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR से संबंधित था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने 29 मई 2023 को इन अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR और संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया था।

हाईकोर्ट का मानना था कि कथित अपराध सरकारी ड्यूटी के दौरान किए गए थे, इसलिए अधिकारियों के खिलाफ जांच और अभियोजन के लिए धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी आवश्यक थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या को गलत ठहराया। अदालत ने कहा कि धारा 197 के तहत संरक्षण FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने पर रोक नहीं लगाता। 

क्या है पूरा मामला?

मामले के शिकायतकर्ता श्री अनुमंडला राजेश रेड्डी ने आरोप लगाया था कि व्यावसायिक विवाद के बाद उन्हें एक आपराधिक मामले में झूठा फंसाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा गया और पुलिस अधिकारियों ने कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने स्थानीय पुलिस और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी शिकायत दर्ज कराई।

मजिस्ट्रेट ने 1 अगस्त 2022 को CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया। इसके बाद 12 अगस्त 2022 को FIR दर्ज की गई।

हालांकि, पुलिस अधिकारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR और संबंधित कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली थी, जिसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

FIR, जांच और संज्ञान के बीच अंतर स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आपराधिक न्याय प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों को स्पष्ट किया। अदालत के अनुसार, इसकी सामान्य प्रक्रिया इस प्रकार है:

  1. संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को मिलती है।
  2. पुलिस FIR दर्ज करती है।
  3. पुलिस मामले की जांच करती है।
  4. जांच पूरी होने पर पुलिस अपनी रिपोर्ट दाखिल करती है।
  5. इसके बाद अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने का प्रश्न आता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने और जांच का आदेश इस प्रक्रिया का शुरुआती चरण है। इसलिए इस स्तर पर धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। 

जांच के बाद मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों को धारा 197 के तहत मिलने वाला कानूनी संरक्षण समाप्त नहीं हुआ है।

यदि जांच में अपराध साबित होने के पर्याप्त आधार मिलते हैं और यह निष्कर्ष निकलता है कि कथित कृत्य सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किए गए थे, तो अभियोजन के लिए मंजूरी की आवश्यकता पर विचार किया जा सकता है।

अर्थात, FIR दर्ज करने और जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं है, लेकिन अदालत द्वारा संज्ञान लेने के चरण में संबंधित कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने जांच दोबारा शुरू करने का दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 29 मई 2023 के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद जांच एजेंसी ने 20 सितंबर 2023 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अंतिम रिपोर्ट को दोबारा खोला जाए और जांच उसी चरण से फिर शुरू की जाए, जहां उसे रोका गया था। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित अपीलों को स्वीकार कर लिया। 

सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामलों में अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला FIR दर्ज करने, पुलिस जांच और अदालत द्वारा संज्ञान लेने के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सरकारी अधिकारियों को धारा 197 के तहत मिलने वाला संरक्षण FIR दर्ज करने या जांच शुरू करने पर स्वतः रोक नहीं लगाता।

केस का नाम: Sri Anumandala Rajesh Reddy vs. State of Karnataka & Anr.
केस नंबर: 2026 INSC 1039
फैसले की तारीख: 24 अगस्त 2026
पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
संबंधित प्रावधान: धारा 156(3) और धारा 197, CrPC

Supreme Court News, Section 197 CrPC, Section 156(3) CrPC, FIR Rules, Government Officers, Legal News, Supreme Court Judgment, Indian Law

#SupremeCourt #LegalUpdate #Section197 #CrPC #FIR #IndianLaw #CourtVerdict #BaghpatWire

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *