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आर्य समाज मंदिर का विवाह प्रमाणपत्र वैध शादी का पक्का सबूत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट, SSB अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द

प्रकाशन तिथि: 26 सितंबर 2026

लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने आर्य समाज मंदिर में हुए विवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैध विवाह होना साबित नहीं माना जा सकता। इसके लिए निर्धारित धार्मिक रीति-रिवाजों और आवश्यक संस्कारों का संपन्न होना भी जरूरी है।

न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने 18 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाते हुए सशस्त्र सीमा बल (SSB) के अधिकारी रोहित पांडेय की बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने उन्हें दोबारा ड्यूटी पर लेने का निर्देश दिया। हालांकि, बर्खास्तगी की अवधि के वेतन के संबंध में ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू किया गया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला SSB अधिकारी रोहित पांडेय से जुड़ा है। उनके खिलाफ आरोप था कि उन्होंने वर्ष 2007 में सुचेता तिवारी के साथ आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था, लेकिन बाद में सरकारी सेवा में प्रवेश के दौरान खुद को अविवाहित बताया।

इसी कथित विवाह को आधार बनाकर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई थी। कार्रवाई के बाद 28 अप्रैल 2022 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद रोहित पांडेय ने बर्खास्तगी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने विवाह के जरूरी संस्कारों पर क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह की वैधता के लिए संबंधित पक्षों द्वारा आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाजों और संस्कारों का वास्तव में संपन्न होना जरूरी है।

अदालत के मुताबिक, जहां संबंधित परंपरा में सप्तपदी यानी सात फेरे विवाह का आवश्यक संस्कार है, वहां उसका संपन्न होना महत्वपूर्ण है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आर्य समाज मंदिर से जारी विवाह प्रमाणपत्र अपने आप में यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध विवाह हुआ था।

सप्तपदी का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिला

मामले में उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने पाया कि कथित विवाह के दौरान आवश्यक हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के संपन्न होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं था।

ऐसे में केवल विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर रोहित पांडेय के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई को उचित नहीं माना गया। हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया।

SSB अधिकारी को दोबारा नौकरी पर लेने का आदेश

हाईकोर्ट ने 28 अप्रैल 2022 को जारी बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त करते हुए रोहित पांडेय को पुनः ड्यूटी पर लेने का निर्देश दिया।

हालांकि, अदालत ने 28 अप्रैल 2022 से फैसले की तारीख तक की अवधि के लिए ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत लागू किया। इसका अर्थ है कि इस अवधि का वेतन उन्हें नहीं मिलेगा। लेकिन इस अवधि को उनकी सेवा में ब्रेक भी नहीं माना जाएगा।

विवाह प्रमाणपत्र और वैध विवाह में अंतर

हाईकोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट होता है कि विवाह प्रमाणपत्र और कानूनी रूप से वैध विवाह का प्रमाण हमेशा एक समान नहीं होते। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह की वैधता तय करते समय आवश्यक धार्मिक संस्कारों का संपन्न होना और उनसे संबंधित साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

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