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महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: आवेदन की तारीख से मिलेगा गुजारा भत्ता, पति को 4 महीने में चुकाने होंगे बकाया रुपये

नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026 | Baghpat Wire

सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी और बच्चों को गुजारा भत्ता देने का आदेश सामान्यतः आवेदन दाखिल करने की तारीख से लागू होना चाहिए, न कि फैसला सुनाए जाने की तारीख से। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी का नुकसान भरण-पोषण मांगने वाले व्यक्ति को नहीं उठाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने Rajnesh vs. Neha (2021) के फैसले में इस संबंध में दिशा-निर्देश दिए थे। वहीं, Shahjahan vs. State of Uttar Pradesh (2025) मामले में भी अदालत ने आवेदन की तारीख से भरण-पोषण देने का निर्देश दिया और बकाया राशि चार महीने के भीतर जमा करने को कहा। 

1. क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण से जुड़े कानून का उद्देश्य जरूरतमंद पत्नी और बच्चों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। इसका मकसद उन्हें आर्थिक तंगी और बेसहारा होने की स्थिति से बचाना है।

अदालत ने माना कि भरण-पोषण के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने में काफी समय लग सकता है। ऐसे में यदि गुजारा भत्ता केवल फैसला सुनाए जाने की तारीख से दिया जाए, तो आवेदन करने वाले व्यक्ति को अनावश्यक आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से Rajnesh vs. Neha मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित मामलों में आवेदन दाखिल करने की तारीख से भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था। 

2. Shahjahan मामले में चार महीने में बकाया चुकाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी 2025 को Shahjahan vs. State of Uttar Pradesh & Anr. मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

इस मामले में अदालत ने पत्नी को 4,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया। यह राशि भरण-पोषण याचिका दाखिल करने की तारीख से देय की गई।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पति पहले से भुगतान की गई राशि का समायोजन करने के बाद पूरा बकाया चार महीने के भीतर फैमिली कोर्ट में जमा करे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बेटी के बालिग होने के बाद उसके लिए भरण-पोषण की राशि देय नहीं होगी। 

3. आवेदन की तारीख से भरण-पोषण क्यों जरूरी?

सुप्रीम कोर्ट ने Rajnesh vs. Neha के फैसले में बताया कि भरण-पोषण के मामलों में देरी होने से आश्रित पत्नी और बच्चों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

यदि अदालत में मामला कई वर्षों तक लंबित रहता है, तो उस दौरान होने वाली आर्थिक परेशानियों को ध्यान में रखना जरूरी है।

इसीलिए अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार आवेदन दाखिल करने की तारीख से जुड़ा होना चाहिए, क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाला समय आमतौर पर आवेदक के नियंत्रण में नहीं होता। 

4. क्या अंतरिम भरण-पोषण भी आवेदन की तारीख से मिलेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने Rajnesh vs. Neha में अंतरिम भरण-पोषण के मामलों के निस्तारण के लिए भी दिशा-निर्देश दिए हैं।

हालांकि, आवेदन दाखिल करने मात्र से भरण-पोषण अपने आप मिलना शुरू नहीं हो जाता। अदालत को मामले के तथ्यों, पक्षकारों की आर्थिक स्थिति और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर भरण-पोषण का आदेश देना होता है।

यदि अदालत आवेदन की तारीख से भरण-पोषण देने का आदेश देती है, तो उस तारीख से बकाया राशि की गणना की जा सकती है। 

5. महिलाओं के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?

इस फैसले से उन महिलाओं और बच्चों को राहत मिल सकती है जिनके भरण-पोषण के मामले लंबे समय तक अदालत में लंबित रहते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी महिला ने 2022 में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया और अदालत ने 2026 में उसके पक्ष में आदेश दिया, तो अदालत के आदेश के अनुसार उसे 2022 से भरण-पोषण मिल सकता है।

ऐसी स्थिति में बकाया राशि की गणना आवेदन की तारीख से की जाएगी। हालांकि, वास्तविक राशि अदालत के आदेश, भुगतान की गई रकम और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

6. धारा 125 CrPC और धारा 144 BNSS में क्या अंतर है?

पहले भरण-पोषण से जुड़े मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 लागू होती थी। 1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू होने के बाद इसी विषय से संबंधित प्रावधान धारा 144 में शामिल किया गया है।

Rajnesh vs. Neha का फैसला धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण के मामलों से संबंधित है। इसके सिद्धांतों को नए कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में भी समझना महत्वपूर्ण है। 

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के Rajnesh vs. Neha और Shahjahan vs. State of Uttar Pradesh फैसले भरण-पोषण के मामलों में आवेदन की तारीख के महत्व को स्पष्ट करते हैं। इन फैसलों का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण आश्रित पत्नी और बच्चों को होने वाली आर्थिक परेशानी को कम करना है।

हालांकि, हर मामले में भरण-पोषण की पात्रता, राशि और भुगतान की समयसीमा अदालत के आदेश तथा संबंधित परिस्थितियों के अनुसार तय होगी।

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