नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: 2021 के लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से ट्रायल जज के कामकाज को लेकर उठाई गई चिंताओं पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से मामले को देखने और उचित कार्रवाई करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत से संबंधित आवेदन की प्रति हाईकोर्ट को भेजने का निर्देश दिया है और हाईकोर्ट से कार्रवाई के बाद सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजने को कहा है।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से मामले की पैरवी के लिए एक वरिष्ठ और अनुभवी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (PP) नियुक्त करने को कहा है। सरकार को इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर निर्णय लेकर रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया गया है।
यह मामला Ashish Mishra alias Monu v. State of U.P., SLP (Crl.) No. 7857/2022 से संबंधित है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की।
ट्रायल जज के खिलाफ क्या शिकायत की गई?
पीड़ित परिवारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष ट्रायल जज के कामकाज को लेकर कई चिंताएं रखीं। उन्होंने दावा किया कि एक महत्वपूर्ण गवाह के बीमार होने और चिकित्सकीय दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने के बावजूद उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया।
भूषण ने यह भी आरोप लगाया कि ट्रायल जज के समक्ष अन्य मामलों में भी ऐसी कार्यवाही हुई, जिस पर हाईकोर्ट को गौर करना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से NDPS और SC/ST अधिनियम से जुड़े मामलों का उल्लेख किया और आरोप लगाया कि कुछ मामले दूसरी अदालतों से ट्रायल जज के पास आए तथा उनमें आरोपियों को राहत मिली।
हालांकि, ये सभी आरोप पीड़ित पक्ष की ओर से अदालत में रखी गई दलीलें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को स्वयं सही ठहराने वाला कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने इन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रशासनिक और न्यायिक परीक्षण के लिए भेजा है।
बीमार गवाह के खिलाफ गैर-जमानती वारंट का मुद्दा
सुनवाई के दौरान गवाह की गैर-मौजूदगी भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनी। पीड़ित पक्ष ने कहा कि संबंधित गवाह ने बीमारी के कारण अदालत में उपस्थित न हो पाने की जानकारी दी थी और इसके समर्थन में मेडिकल दस्तावेज भी दिए गए थे।
इसके बावजूद उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने पर आपत्ति जताई गई। पीड़ित पक्ष ने दावा किया कि बाद में पुलिस गवाह के घर भी गई और उसके परिवार से संपर्क किया गया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस संदर्भ में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ट्रायल को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया है। ऐसे में यदि कोई गवाह बिना पर्याप्त कारण के उपस्थित नहीं होता, तो ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार कदम उठाने पड़ सकते हैं।
CJI ने यह भी संकेत दिया कि ट्रायल को जल्द पूरा करने के लिए अदालत पर पड़ने वाले दबाव को भी ध्यान में रखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने NDPS मामलों पर क्या कहा?
प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान यह भी आरोप लगाया कि संबंधित न्यायिक अधिकारी ने कुछ NDPS और SC/ST मामलों को अपने पास लिया और उनमें आरोपियों को राहत दी।
इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सामने फिलहाल उन मामलों की मेरिट का मुद्दा नहीं है और प्रशासनिक स्तर पर ऐसे सवालों को हाईकोर्ट देख सकता है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी संकेत दिया कि ट्रायल जज के प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े सवालों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट उचित रूप से विचार कर सकता है।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत को सीधे ट्रायल जज के खिलाफ कोई आदेश जारी करने के बजाय इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को लेकर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान मामले की पैरवी कर रहे पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को लेकर भी पीड़ित पक्ष ने आपत्ति जताई।
प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि पहले नियुक्त पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को बदल दिया गया और उनकी जगह अपेक्षाकृत कम अनुभव वाले नए अभियोजक को लगाया गया। पीड़ित पक्ष ने आरोप लगाया कि कुछ महत्वपूर्ण गवाहों को अभियोजन की ओर से आगे नहीं बढ़ाया गया।
जस्टिस बागची ने इस पहलू पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि महत्वपूर्ण गवाहों को छोड़ दिया जाता है, तो यह निष्पक्ष अभियोजन के उद्देश्य से संबंधित सवाल खड़े कर सकता है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि वह मामले के लिए वरिष्ठ और अनुभवी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करे। सरकार को इस संबंध में दो सप्ताह में निर्णय लेने और उसे रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया गया है।
साइट प्लान रिकॉर्ड से गायब होने का आरोप
पीड़ित पक्ष की ओर से सुनवाई के दौरान एक अन्य गंभीर दावा भी किया गया। अदालत को बताया गया कि हिंसा से संबंधित साइट प्लान कथित रूप से ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड से गायब हो गया है।
प्रशांत भूषण ने इस आधार पर भी ट्रायल जज को बदलने का अनुरोध किया और कहा कि यदि वर्तमान न्यायिक अधिकारी के समक्ष ट्रायल जारी रहा तो इससे न्यायिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
इस आरोप पर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया। अदालत ने मामले से जुड़ी शिकायत को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास भेजने का निर्णय लिया है, ताकि हाईकोर्ट तथ्यों और रिकॉर्ड की जांच कर उचित कार्रवाई कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल जज को हटाने का आदेश नहीं दिया
सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष ने ट्रायल जज को मामले से हटाने की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सीधे ऐसा आदेश देने के बजाय शिकायत को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, रजिस्ट्री शिकायत की प्रति हाईकोर्ट को भेजेगी और हाईकोर्ट से मामले की जांच कर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है। इसके बाद हाईकोर्ट को अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को भेजनी होगी।
इसका अर्थ है कि फिलहाल ट्रायल जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम न्याय















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