
जालौन, 09 अगस्त : उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में श्रावण मास आते ही भगवान शिव की आराधना का सिलसिला तेज हो जाता है। मंदिरों में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, लेकिन शिव उपासना केवल किसी एक स्वरूप की पूजा तक सीमित नहीं है।
शिव को सनातन परंपरा में उस परम तत्व के रूप में देखा गया है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और अंत में उसके विलय का आधार है। जालौन जनपद में भी भगवान शिव के अनेक प्राचीन और लोक आस्था से जुड़े स्वरूप इस व्यापक शिव तत्व की अनुभूति कराते हैं।
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. हरिमोहन पुरवार के अनुसार जालौन में पातालेश्वर, धोरेश्वर, गोपेश्वर, भुवनेश्वर, रामेश्वरम, बेनेश्वर, तिगड़ेश्वर, फलेरेश्वर और भूलेश्वर महादेव जैसे अनेक शिव स्वरूपों की मान्यता है। कालपी सहित जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित शिवालय स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उनका कहना है कि इन अलग-अलग नामों और रूपों के पीछे मूल भाव एक ही है—कण-कण में शिव का वास और प्रत्येक जीव में शिव तत्व की उपस्थिति।
शिव तत्व को समझाने वाली पुराण परंपरा में भृंगी ऋषि की कथा विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि भृंगी ऋषि परम शिवभक्त थे और उनका जीवन भगवान शिव की आराधना में समर्पित था। वे वैराग्य और संन्यास के स्वरूप को ही शिव का वास्तविक रूप मानते थे। एक बार जब वे भगवान शिव की पूजा कर रहे थे, तब माता पार्वती भी उनके समीप विराजमान थीं। ऋषि केवल भगवान शिव की परिक्रमा करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने भंवरे का रूप धारण किया और केवल शिव की परिक्रमा करने लगे।
भृंगी ऋषि की इस सीमित दृष्टि को दूर करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती ने संयुक्त रूप धारण किया। दोनों ने अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट होकर यह संदेश दिया कि शिव और शक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। अर्धनारीश्वर के आधे भाग में शिव और आधे में पार्वती का स्वरूप था। इस रूप को देखकर भृंगी ऋषि को बोध हुआ कि सृष्टि में पुरुष और प्रकृति, चेतना और शक्ति तथा शिव और पार्वती अलग-अलग दिखाई देने के बावजूद मूल रूप से एक ही सत्ता के दो आयाम हैं।
यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि शिव तत्व की व्यापक अवधारणा का प्रतीक मानी जाती है। इसका संदेश है कि किसी एक रूप को ही संपूर्ण सत्य मानकर बाकी अस्तित्व को अलग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक रूप उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति है और समस्त संसार शिवमय है।
श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय मास माना जाता है। वर्षा ऋतु में प्रकृति का रूप निखर उठता है। धरती हरियाली से भर जाती है और वातावरण शीतल एवं निर्मल हो जाता है। इसी कारण श्रावण को शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है। प्रकृति को पार्वती स्वरूपा मानते हुए श्रद्धालु इस महीने शिव की आराधना करते हैं।
सनातन परंपरा में कहा गया है—‘अलंकारप्रिय विष्णु, अभिषेकप्रिय शिव।’ भगवान विष्णु जहां अलंकार और श्रृंगार से जुड़े माने जाते हैं, वहीं भगवान शिव को अभिषेक अत्यंत प्रिय बताया गया है। श्रावण में जब आकाश से लगातार वर्षा होती है तो यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं प्रकृति शिव का जलाभिषेक कर रही हो। इसी भाव से श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।
भगवान शिव का कैलास पर्वत पर निवास भी आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। कैलास को केवल भौगोलिक पर्वत के रूप में नहीं, बल्कि उस अवस्था के प्रतीक के रूप में देखा जाता है जहां आनंद, शांति और उत्सव का अनुभव हो। जब मनुष्य के भीतर शिव तत्व जागृत होता है तो उसका जीवन भी आनंद और उत्सव से भर जाता है। जहां शांति, करुणा, संतुलन और आनंद है, वहीं शिव तत्व की अनुभूति होती है।
शिव किसी एक व्यक्ति, आकृति या सीमित रूप का नाम नहीं, बल्कि सनातन दर्शन में परम चेतना का प्रतीक हैं। आकाश से लेकर चेतना तक, ऊर्जा से लेकर अस्तित्व तक शिव तत्व की व्यापक व्याख्या की जाती है। श्रावण मास इसी अनुभूति को आत्मसात करने का अवसर प्रदान करता है।
जालौन के प्राचीन शिवालयों में गूंजती घंटियों, हर-हर महादेव के जयघोष और जलाभिषेक की परंपरा के बीच यही संदेश उभरता है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि प्रकृति, जीव-जगत और मानव चेतना के प्रत्येक कण में विद्यमान हैं। श्रावण में शिव आराधना का वास्तविक भाव इसी व्यापक कल्याण की भावना से जुड़ा है—‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और सभी के जीवन में शिवत्व, शांति तथा कल्याण का उदय हो।














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