लखनऊ | 14 सितंबर 2026
गोंडा के विनोद साहनी हत्याकांड को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। पुलिस की भूमिका को लेकर कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के लगातार मुखर होने के बाद अब उनके राजनीतिक रुख को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। खास चर्चा इस बात की है कि क्या संजय निषाद और भाजपा के बीच सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा?
संजय निषाद ने हाल ही में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात की। इससे पहले वह लखनऊ के केजीएमयू में विनोद साहनी हत्याकांड में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए धरने में भी शामिल हुए थे। उनके इस रुख को विपक्ष के साथ बढ़ते संवाद के तौर पर देखा जा रहा है।
सपा के करीब आने की अटकलें क्यों?
संजय निषाद की माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात के बाद लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या निषाद पार्टी आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अपना राजनीतिक समीकरण बदल सकती है?
हालांकि, केवल किसी विपक्षी नेता से मुलाकात को गठबंधन बदलने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। संजय निषाद की ओर से समाजवादी पार्टी के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा सामने आए बिना इसे फिलहाल राजनीतिक अटकल ही माना जाना चाहिए।
ओम प्रकाश राजभर के बाद नया राजनीतिक मोर्चा?
उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति में छोटे दलों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ओम प्रकाश राजभर के भाजपा से अलग होने और बाद में दोबारा सत्ता पक्ष के साथ आने जैसे घटनाक्रमों ने यह दिखाया है कि यूपी की राजनीति में सहयोगी दलों के समीकरण तेजी से बदल सकते हैं।
ऐसे में संजय निषाद का भाजपा नेतृत्व के सामने अपनी मांगों और नाराजगी को खुलकर रखना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निषाद समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर वह लंबे समय से अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं।
क्या अखिलेश यादव संजय निषाद को साथ लेंगे?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर संजय निषाद और भाजपा के बीच दूरी बढ़ती है, तो क्या समाजवादी पार्टी उन्हें अपने गठबंधन में शामिल करेगी?
इसका जवाब अभी साफ नहीं है। अखिलेश यादव के लिए भी किसी सहयोगी को साथ लेने का फैसला केवल जातीय समीकरणों पर निर्भर नहीं होगा। सीट बंटवारा, क्षेत्रीय प्रभाव, संगठनात्मक ताकत और चुनावी रणनीति जैसे कई पहलू इसमें महत्वपूर्ण होंगे।
दूसरी ओर, संजय निषाद के लिए भी भाजपा से दूरी बनाना आसान फैसला नहीं होगा। पिछले कई चुनावों में भाजपा और निषाद पार्टी के बीच गठबंधन रहा है और दोनों दलों ने एक-दूसरे के राजनीतिक आधार का इस्तेमाल किया है।
यूपी चुनाव से पहले गठबंधन की राजनीति होगी दिलचस्प
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले छोटे और क्षेत्रीय दलों की भूमिका एक बार फिर अहम हो सकती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने के लिए सहयोगी दलों की तलाश करेंगे।
ऐसे में संजय निषाद का हालिया रुख भाजपा के लिए निश्चित तौर पर राजनीतिक संदेश माना जा सकता है। लेकिन इसे भाजपा से औपचारिक बगावत या सपा में शामिल होने की तैयारी कहना अभी जल्दबाजी होगी।
फिलहाल विनोद साहनी हत्याकांड में पुलिस की कार्रवाई और न्याय की मांग संजय निषाद के सार्वजनिक रुख का प्रमुख मुद्दा है। आने वाले दिनों में उनका राजनीतिक रुख किस दिशा में जाता है, यही तय करेगा कि यह सिर्फ सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति है या फिर यूपी की गठबंधन राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।
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