प्रकाशन तिथि: 1 अक्टूबर 2026
स्थान: प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट: आरोपी पर दबाव बनाने के लिए उसके परिवार के निर्दोष सदस्य को हिरासत में रखना गैरकानूनी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस किसी आरोपी को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उसके परिवार के किसी निर्दोष सदस्य को अवैध रूप से हिरासत में नहीं रख सकती। ऐसा करना व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है और पीड़ित व्यक्ति इसके लिए मुआवजे का हकदार है।

हाईकोर्ट ने प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने में कथित अवैध हिरासत के मामले में याचिकाकर्ता अरविंद कुमार यादव को ₹40,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि उन पुलिसकर्मियों के वेतन से वसूल की जाए, जो इस अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार थे। हालांकि, किस पुलिसकर्मी से कितनी राशि वसूली जाएगी, इसका निर्धारण राज्य सरकार करेगी।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने अरविंद कुमार यादव की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों के आचरण पर नाराजगी जताते हुए उनके सर्विस रिकॉर्ड में भी इसे दर्ज करने का निर्देश दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। यह एफआईआर अरविंद कुमार यादव के भाई सुरेश कुमार के खिलाफ दर्ज की गई थी। शुरुआत में पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 126(2), 191(2), 352, 115(2) और 75 के तहत आरोप दर्ज किए थे। बाद में जांच के दौरान मामले में हत्या के प्रयास से संबंधित धारा 109 भी जोड़ दी गई।

अरविंद कुमार यादव का कहना था कि उनका इस आपराधिक मामले से कोई संबंध नहीं था। इसके बावजूद पुलिस उन्हें 23 जून 2026 को जौनपुर स्थित उनके घर से उठाकर प्रयागराज के जॉर्ज टाउन थाने ले गई।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, उन्हें करीब चार दिनों तक पुलिस थाने में रखा गया और 26 जून 2026 को शाम लगभग सात बजे रिहा किया गया। उन्होंने अपनी याचिका में इस कथित अवैध हिरासत को चुनौती देते हुए अदालत से न्याय की मांग की थी।

अपनी दलील के समर्थन में अरविंद कुमार यादव ने रिहाई के समय तैयार किए गए सुपुर्दगीनामा को भी अदालत के सामने पेश किया। इस दस्तावेज में 26 जून को उन्हें सौंपे जाने का उल्लेख था। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर दावा किया कि उन्हें कई दिनों तक गैरकानूनी तरीके से पुलिस हिरासत में रखा गया।

पुलिस ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता को थाने लाया गया था

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था। इसके बाद जांच अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए और उन्होंने बताया कि थाना प्रभारी (SHO) योगेंद्र कुमार सिंह के निर्देश पर वह अन्य पुलिसकर्मियों के साथ याचिकाकर्ता के घर गए थे।

जांच अधिकारी के अनुसार, पुलिस अरविंद कुमार यादव को पूछताछ के लिए 23 जून 2026 को थाने लेकर आई थी। हालांकि, इस दौरान याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने की अवधि और उसकी वैधता मामले का प्रमुख मुद्दा बन गई।

राज्य सरकार की ओर से भी इस बात का विवाद नहीं किया गया कि अरविंद कुमार यादव 26 जून को शाम करीब सात बजे तक थाने में रहे थे। अदालत ने इस मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच की।

CDR और CCTV फुटेज से सामने आई अहम जानकारी

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की पुलिस थाने में मौजूदगी की पुष्टि करने के लिए उसके मोबाइल फोन का कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पेश करने का निर्देश दिया था। अदालत के सामने पेश किए गए CDR से पता चला कि 23 जून को अरविंद कुमार यादव की शुरुआती लोकेशन जौनपुर के बदलापुर क्षेत्र में थी।

इसके बाद उनकी लोकेशन प्रयागराज की ओर बढ़ी। सुबह 7 बजकर 56 मिनट पर उनका मोबाइल फोन जॉर्ज टाउन क्षेत्र में दर्ज हुआ। इसी क्षेत्र में संबंधित पुलिस थाना स्थित है।

रिकॉर्ड के मुताबिक, उनका मोबाइल फोन दोपहर 12 बजकर 11 मिनट पर बंद हो गया। इसके बाद 27 जून को सुबह 8 बजकर 8 मिनट पर उनका फोन जौनपुर में दोबारा चालू हुआ।

अदालत ने पुलिस थाने की सीसीटीवी फुटेज का भी परीक्षण किया। फुटेज से यह पुष्टि हुई कि अरविंद कुमार यादव 23 जून से 25 जून तक जॉर्ज टाउन थाने में मौजूद थे। हालांकि, 26 जून की सीसीटीवी फुटेज अदालत के सामने पेश नहीं की गई।

CDR, सीसीटीवी फुटेज और अन्य दस्तावेजों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता कम से कम चार दिनों तक पुलिस की अवैध हिरासत में रहे। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस तथ्य को निर्विवाद माना।

आरोपी भाई पर दबाव बनाने के लिए हिरासत में रखने की बात

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को हिरासत में रखने के पीछे की परिस्थितियों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अरविंद कुमार यादव को उनके भाई सुरेश कुमार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से थाने में रखा गया था।

सुरेश कुमार उस मामले में आरोपी थे, जिसमें पुलिस ने शुरुआत में कई धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी और बाद में हत्या के प्रयास की धारा भी जोड़ दी थी।

अदालत के अनुसार, याचिकाकर्ता का कथित अपराध से कोई संबंध नहीं था। इसके बावजूद उन्हें हिरासत में रखा गया, ताकि उनके आरोपी भाई पर दबाव बनाया जा सके और उन्हें पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया जा सके।

गौरतलब है कि आरोपी सुरेश कुमार को बाद में अगस्त 2026 में अग्रिम जमानत मिल गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा- निर्दोष व्यक्ति को हिरासत में रखना गैरकानूनी

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर स्पष्ट टिप्पणी की। खंडपीठ ने कहा कि पुलिस किसी निर्दोष व्यक्ति को, जिसका कथित अपराध से कोई संबंध नहीं है, केवल इसलिए गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रख सकती कि उसके परिवार का कोई आरोपी सदस्य आत्मसमर्पण कर दे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी पर दबाव बनाने के लिए उसके परिवार के निर्दोष सदस्य की स्वतंत्रता छीनना कानून के खिलाफ है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी हिरासत व्यक्ति की स्वतंत्रता से गैरकानूनी वंचना के समान है। इससे प्रभावित व्यक्ति मुआवजे का हकदार है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि अवैध हिरासत की अवधि कम होने से पुलिस की कार्रवाई कानूनी नहीं हो जाती।

इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को बिना वैध आधार के हिरासत में रखने की कार्रवाई को केवल इसलिए उचित नहीं ठहराया जा सकता कि पुलिस किसी अन्य आरोपी को गिरफ्तार करना या उससे आत्मसमर्पण कराना चाहती है।

पुलिस अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज होगी नाराजगी

हाईकोर्ट ने मामले में थाना प्रभारी योगेंद्र कुमार सिंह और जांच अधिकारी अश्वनी साविता के आचरण पर नाराजगी जताई।

खंडपीठ ने निर्देश दिया कि दोनों पुलिस अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज की जाए। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता अरविंद कुमार यादव को ₹40,000 का मुआवजा देने का आदेश दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि सरकारी खजाने पर अंतिम बोझ के रूप में नहीं छोड़ी जाएगी। अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के वेतन से इस राशि की वसूली की जाएगी।

हालांकि, संबंधित पुलिसकर्मियों के बीच मुआवजे की राशि किस अनुपात में बांटी जाएगी और किससे कितनी वसूली होगी, इसका फैसला राज्य सरकार करेगी।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण

अरविंद कुमार यादव की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में पुलिस हिरासत को चुनौती दी गई थी। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, पुलिस अधिकारियों के बयानों और संबंधित दस्तावेजों पर विचार करने के बाद अवैध हिरासत का निष्कर्ष निकाला।

इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को ₹40,000 मुआवजा देने और संबंधित पुलिसकर्मियों के वेतन से इसकी वसूली करने का निर्देश दिया। साथ ही दोनों पुलिस अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का आदेश दिया।

इन निर्देशों के साथ अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण कर दिया।

पुलिस की कार्रवाई पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के परिवार के सदस्य को केवल उस पर दबाव बनाने के लिए हिरासत में रखना स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई से प्रभावित व्यक्ति मुआवजे का दावा कर सकता है। इस मामले में ₹40,000 का मुआवजा देने के साथ-साथ संबंधित पुलिसकर्मियों के वेतन से राशि वसूलने का आदेश दिया गया है।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि किसी आपराधिक मामले की जांच के दौरान पुलिस को कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी होगी। किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उसके निर्दोष परिजनों की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

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