3 अक्टूबर 2026 | Baghpat Wire
नई दिल्ली: भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान की संवैधानिक और वैधानिक वैधता की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के पूर्व न्यायाधीशों का एक स्वतंत्र आयोग गठित किया गया है। पांच स्तरों पर काम करने वाला यह आयोग एसआईआर की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा योग्य मतदाताओं पर इसके संभावित प्रभाव की समीक्षा करेगा। आयोग ने दिसंबर 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक करने का लक्ष्य रखा है।
‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ (एलएएफसी) ने शुक्रवार को इस स्वतंत्र आयोग के गठन की घोषणा की। आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर करेंगे। आयोग को पूरी तरह स्वायत्त रूप से काम करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके गठन का उद्देश्य एसआईआर प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं की न्यायिक और कानूनी दृष्टिकोण से समीक्षा करना है।
पूर्व न्यायाधीशों को सौंपी गई आयोग की जिम्मेदारी
एसआईआर की जांच के लिए गठित आयोग में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पांच पूर्व न्यायाधीश शामिल किए गए हैं। आयोग की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर करेंगे। उनके साथ उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए. पटनायक भी आयोग का हिस्सा होंगे।
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बद्र दुर्रेज अहमद, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रेखा शर्मा और पटना उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश को भी आयोग में शामिल किया गया है।
आयोग के सभी सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उन्हें एसआईआर प्रक्रिया की संवैधानिक और वैधानिक वैधता की समीक्षा करने तथा इसके विभिन्न पहलुओं पर निष्कर्ष तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
एलएएफसी के अनुसार, आयोग स्वतंत्र रूप से अपना काम करेगा। इसके अंतिम निष्कर्ष और सिफारिशें आयोग के न्यायिक सदस्यों की जिम्मेदारी होंगी। संस्था ने स्पष्ट किया है कि अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में किसी बाहरी संगठन का प्रभाव नहीं होगा।
पांच स्तरों पर होगी एसआईआर प्रक्रिया की जांच
इस आयोग की कार्यप्रणाली को पांच स्तरों पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य केवल कानूनी प्रावधानों की समीक्षा करना ही नहीं, बल्कि एसआईआर के व्यावहारिक प्रभावों को भी समझना है।
आयोग देश के विभिन्न हिस्सों में जनसुनवाई आयोजित करेगा। इन जनसुनवाइयों के माध्यम से नागरिकों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और विषय विशेषज्ञों से सीधे प्रतिक्रिया ली जाएगी। इससे आयोग को यह समझने में मदद मिलेगी कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान लोगों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
जनसुनवाई के दौरान प्राप्त जानकारी आयोग की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। इसके जरिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने से जुड़ी प्रक्रिया के वास्तविक प्रभावों को समझने का प्रयास किया जाएगा।
मतदाता सूची के आंकड़ों का होगा विश्लेषण
आयोग के तहत एक समर्पित शोध शाखा भी काम करेगी। यह शाखा मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने और हटाने से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण करेगी।
शोध शाखा का काम उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एसआईआर प्रक्रिया के प्रभावों को समझना होगा। मतदाता सूची में बदलाव से संबंधित आंकड़ों की समीक्षा के जरिए यह जांच की जाएगी कि पुनरीक्षण के दौरान किस प्रकार के बदलाव हुए हैं।
इस विश्लेषण के निष्कर्ष आयोग की व्यापक जांच में शामिल किए जाएंगे। हालांकि, आयोग की अंतिम रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष सामने आएंगे, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
कानूनी सहायता टीम करेगी नियमों की समीक्षा
एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के पालन की जांच के लिए आयोग के साथ एक कानूनी सहायता टीम भी काम करेगी। यह टीम संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करेगी।
इसका प्रमुख उद्देश्य यह जांचना होगा कि एसआईआर के दौरान संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया है या नहीं। मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया से जुड़े कानूनी पहलुओं की समीक्षा भी इसी कार्य का हिस्सा होगी।
आयोग के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल होगा कि एसआईआर की प्रक्रिया लागू नियमों के अनुरूप संचालित हुई है या नहीं और इसका योग्य मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
वरिष्ठ वकील देंगे रणनीतिक कानूनी सलाह
इस जांच में कई वरिष्ठ वकील भी आयोग को रणनीतिक कानूनी सलाह देंगे। इनमें कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण, राजू रामचंद्रन, चंदर उदय सिंह और वृंदा ग्रोवर जैसे नाम शामिल हैं।
ये वरिष्ठ वकील जांच से जुड़े कानूनी पहलुओं पर सलाह प्रदान करेंगे। हालांकि, एलएएफसी ने स्पष्ट किया है कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट और सिफारिशें उसके न्यायिक सदस्यों द्वारा ही तय की जाएंगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य कानूनी विशेषज्ञों की सहायता लेते हुए आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखना है। अंतिम निष्कर्षों पर निर्णय लेने का अधिकार आयोग के न्यायिक सदस्यों के पास रहेगा।
एसआईआर को लेकर विपक्ष और नागरिक समूहों की चिंता
एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों और विभिन्न नागरिक समूहों की ओर से चिंताएं जताई जाती रही हैं। उनका आशंका है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान योग्य मतदाताओं के नाम भी मतदाता सूची से हट सकते हैं।
विपक्ष और नागरिक समूहों की ओर से उठाए जा रहे इन सवालों के बीच स्वतंत्र आयोग का गठन हुआ है। आयोग अब एसआईआर की कार्यप्रणाली, कानूनी आधार और मतदाताओं पर इसके संभावित प्रभाव की समीक्षा करेगा।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची से फर्जी प्रविष्टियों को हटाना है। इस तरह एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के उद्देश्य और विपक्ष तथा नागरिक समूहों की आशंकाओं के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।
स्वतंत्र आयोग की जांच में इन मुद्दों से जुड़े कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं की समीक्षा की जाएगी। हालांकि, आयोग ने अभी अपनी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किए हैं।
दिसंबर 2026 तक सार्वजनिक होगी अंतिम रिपोर्ट
एलएएफसी की घोषणा के अनुसार, स्वतंत्र आयोग अपनी जांच पूरी कर दिसंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक करेगा। रिपोर्ट में एसआईआर की संवैधानिक और वैधानिक वैधता, इसकी कार्यप्रणाली तथा योग्य मतदाताओं पर पड़ने वाले प्रभाव से संबंधित निष्कर्ष और सिफारिशें शामिल होंगी।
आयोग की जांच में जनसुनवाई, शोध शाखा द्वारा आंकड़ों का विश्लेषण और कानूनी सहायता टीम की समीक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इन सभी पहलुओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगा।
दिसंबर 2026 में रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर आयोग के निष्कर्ष सामने आएंगे। फिलहाल आयोग की ओर से जांच की प्रक्रिया पूरी करने और निर्धारित समयसीमा में रिपोर्ट जारी करने की तैयारी की गई है।
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