प्रकाशित तिथि: 24 सितंबर 2026
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि सरकार किसी कर्मचारी से करीब तीन दशक तक लगातार सेवा लेती रही है, तो बाद में तकनीकी आधार या स्वीकृत पद नहीं होने का हवाला देकर उसे सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले में कर्मचारी की सेवा समाप्ति के आदेश को खारिज करते हुए पेंशन समेत सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया पूरी होने और कर्मचारी से लंबे समय तक सेवा लेने के बाद प्रशासन बाद में परिस्थितियों के आधार पर नियमों को नहीं बदल सकता।
1997 में कनिष्ठ लिपिक के पद पर हुआ था चयन
मामला पीलीभीत के जिलाधिकारी कार्यालय में कनिष्ठ लिपिक के पद पर चयन से जुड़ा है। वर्ष 1997 में दो सामान्य पदों के लिए भर्ती विज्ञापन जारी किया गया था।
लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद बालकृष्ण शर्मा मेरिट सूची में दूसरे स्थान पर रहे। उनका चयन होने के बाद उन्होंने 12 सितंबर 1997 को पदभार ग्रहण किया।
बाद में विभागीय स्तर पर पदों को लेकर स्थिति बदल गई। विज्ञापित दो पदों में से एक पर मृतक आश्रित कोटे से नियुक्ति कर दी गई और दूसरे पद पर मेरिट में पहले स्थान पर रहे अभ्यर्थी की नियुक्ति हुई।
इसके बाद बालकृष्ण शर्मा की नियुक्ति को अवकाश रिक्ति से जोड़ते हुए उनकी सेवा समाप्त करने की कार्रवाई की गई।
सितंबर 2000 में सेवा समाप्ति का आदेश
विभाग की ओर से सितंबर 2000 में शर्मा की सेवा समाप्त करने का आदेश जारी किया गया। इसके खिलाफ उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
मामला अदालत में विचाराधीन रहने के दौरान विभाग ने उनसे लगातार काम लिया। इस तरह उनकी सेवा करीब 30 वर्षों तक जारी रही।
बाद में सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन के अधिकार को लेकर भी विवाद सामने आया। विभाग की ओर से स्वीकृत पद उपलब्ध नहीं होने का तर्क दिया गया।
हाईकोर्ट ने पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति के आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने सरकार को कर्मचारी को पेंशन और अन्य सभी देय सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश दिया।
अदालत की टिप्पणी का सार यह रहा कि जब किसी कर्मचारी से लंबे समय तक लगातार सेवा ली गई हो, तो सेवानिवृत्ति के समय केवल तकनीकी कमियों या प्रशासनिक विसंगतियों के आधार पर उसके लाभों से इनकार नहीं किया जा सकता।
‘खेल के बीच में नियम नहीं बदले जा सकते’
फैसले में अदालत ने इस सिद्धांत पर जोर दिया कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रशासन ऐसी परिस्थितियां पैदा नहीं कर सकता जिससे चयनित कर्मचारी को नुकसान हो।
मामले में दो सामान्य पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था और चयन प्रक्रिया के बाद बालकृष्ण शर्मा मेरिट सूची में दूसरे स्थान पर आए थे। अदालत के अनुसार, बाद में प्रशासनिक स्तर पर पदों के समायोजन से उत्पन्न स्थिति का नुकसान चयनित अभ्यर्थी को नहीं दिया जा सकता।
लंबे समय तक सेवा लेने के बाद तकनीकी आधार पर रोक नहीं
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि कर्मचारी ने करीब तीन दशक तक सेवा दी। अदालत ने इसी लंबे सेवा काल को महत्वपूर्ण माना और सेवानिवृत्ति लाभों के मामले में प्रशासनिक तकनीकीताओं के आधार पर कर्मचारी को नुकसान पहुंचाने के रुख को स्वीकार नहीं किया।
फैसले का असर उन मामलों पर चर्चा का विषय बन सकता है जहां कर्मचारी लंबे समय तक तदर्थ, अस्थायी या अन्य तकनीकी स्थिति में सरकारी विभागों में सेवाएं देते रहे हैं। हालांकि, किसी अन्य मामले में पेंशन की पात्रता उसके अपने तथ्यों, लागू सेवा नियमों और न्यायिक आदेशों पर निर्भर करेगी।
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