6 अक्टूबर 2026 | Baghpat Wire

संविधान बचाने की बात आज राजनीति के केंद्र में है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात करता दिखाई देता है। लेकिन संविधान की रक्षा की बात करने वालों के लिए यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या संविधान की रक्षा करते हुए उसकी मर्यादा और उसके नियमों का पालन किया जा रहा है?

भारतीय संविधान के भाग-3 में नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए गए हैं। अनुच्छेद 19 नागरिकों को बोलने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देता है। इसी अनुच्छेद के तहत शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार भी नागरिकों को प्राप्त है। यानी लोकतंत्र में विरोध करना, सरकार से सवाल पूछना और अपनी असहमति दर्ज कराना नागरिक अधिकारों का हिस्सा है।

लेकिन इसी संविधान में इन अधिकारों की सीमाओं का भी उल्लेख है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत लोक व्यवस्था, शिष्टाचार और देश की अखंडता सहित निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

यही वह बिंदु है जिस पर आज गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। यदि कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल यह दावा करता है कि वह संविधान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो क्या उसके लिए संविधान में निर्धारित सीमाओं का पालन करना भी उतना ही जरूरी नहीं है?

संविधान की रक्षा का अर्थ संविधान के नियमों का पालन भी है

सरकार के खिलाफ आवाज उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। चुनाव आयोग से सवाल करना, मतदाता सूची पर आपत्ति उठाना या किसी सरकारी फैसले का विरोध करना भी लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में आता है। लेकिन विरोध का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि शिकायत यह है कि सत्ता में बैठे लोग संविधान की मर्यादाओं को कमजोर कर रहे हैं, तो विरोध करने वालों से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी लड़ाई संविधान के दायरे में रहकर लड़ें।

किसी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष और उस व्यवस्था में काम कर रहे हर व्यक्ति को अपना व्यक्तिगत दुश्मन मान लेना दो अलग बातें हैं। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध किया जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ड्यूटी पर तैनात हर पुलिसकर्मी को राजनीतिक लड़ाई का पक्षकार मान लिया जाए।

गांधी का नाम लें तो गांधी का रास्ता भी याद रखना होगा

महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन की नीतियों का खुलकर विरोध किया। उन्होंने सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया और असहमति को आंदोलन का माध्यम बनाया। लेकिन उनके सत्याग्रह का मूल विचार अहिंसा और अनुशासन था।

गांधी का संघर्ष व्यवस्था से था, उस व्यवस्था के हर कर्मचारी से व्यक्तिगत दुश्मनी का नहीं। सत्याग्रह का अर्थ केवल विरोध करना नहीं था, बल्कि विरोध के दौरान भी नैतिक अनुशासन बनाए रखना था।

आज जब गांधी का नाम लेकर लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की बात की जाती है, तो गांधी के संघर्ष के तरीके को भी याद रखना चाहिए। सवाल सरकार से हो सकता है, सवाल प्रशासन से हो सकता है, सवाल किसी संवैधानिक संस्था से हो सकता है, लेकिन ड्यूटी कर रहे व्यक्ति को व्यक्तिगत शत्रु मान लेना गांधी के सत्याग्रह की मूल भावना से मेल नहीं खाता।

पुलिस की कार्रवाई पर सवाल हो सकते हैं, लेकिन सिपाही को निशाना क्यों?

यह भी उतना ही सच है कि पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए जा सकते हैं। यदि कहीं जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग हुआ है, किसी प्रदर्शनकारी के अधिकार का उल्लंघन हुआ है या पुलिस ने नियमों का पालन नहीं किया है, तो उसकी शिकायत होनी चाहिए और उसकी जांच भी होनी चाहिए।

लेकिन दूसरी तरफ यह भी समझना जरूरी है कि सड़क पर ड्यूटी कर रहा एक सिपाही आमतौर पर नीति तय नहीं करता। वह उसे दिए गए आदेश और अपनी ड्यूटी के अनुसार काम करता है।

संविधान ने शासन और प्रशासन के लिए एक संस्थागत ढांचा बनाया है। पुलिस भी उसी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे में किसी राजनीतिक या नीतिगत निर्णय के लिए सड़क पर तैनात पुलिसकर्मी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं माना जा सकता।

इसीलिए पुलिसकर्मियों को लेकर अपमानजनक या उकसाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने से पहले यह सोचना चाहिए कि विरोध का निशाना सही जगह है या नहीं।

‘पुलिस ने भगवा कच्छा पहन लिया’ जैसे बयान किस दिशा में ले जाते हैं?

विरोध के दौरान पुलिस को लेकर किसी तरह की राजनीतिक या अपमानजनक टिप्पणी करना आसान हो सकता है, लेकिन इससे असली मुद्दा पीछे छूट जाता है।

यदि किसी राजनीतिक दल या प्रदर्शनकारी की शिकायत सरकार से है, तो सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए। यदि सवाल चुनाव आयोग से है, तो चुनाव आयोग से जवाब मांगा जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी के फैसले पर आपत्ति है, तो उस फैसले को कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से चुनौती दी जानी चाहिए।

ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी को राजनीतिक प्रतीक बनाकर निशाना बनाने से आंदोलन का मूल मुद्दा कमजोर पड़ सकता है।

माइक लेकर पुलिसकर्मी के चेहरे तक पहुंचना पत्रकारिता नहीं

विरोध प्रदर्शनों के दौरान एक और सवाल पत्रकारिता के तरीके को लेकर उठता है। हाथ में माइक या मोबाइल लेकर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के बिल्कुल चेहरे तक पहुंच जाना और लगातार सवालों से उसे घेरना पत्रकारिता की स्वतंत्रता का सही इस्तेमाल नहीं कहा जा सकता।

सवाल पूछना पत्रकारिता का अधिकार है। सत्ता से सवाल पूछना तो पत्रकारिता की मूल जिम्मेदारियों में शामिल है। लेकिन सवाल पूछने और किसी व्यक्ति को उकसाने या घेरने में अंतर है।

वर्दी के अंदर भी एक इंसान है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा अधिकार देता है, जिसमें गरिमा का महत्व भी है। यह गरिमा प्रदर्शनकारी के लिए जितनी महत्वपूर्ण है, ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मी के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इसलिए पत्रकारिता के नाम पर किसी पुलिसकर्मी के चेहरे के बेहद करीब जाकर उसे उकसाना या उसके साथ अभद्र व्यवहार करना उचित नहीं माना जा सकता। पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है, किसी व्यक्ति को अपमानित करना नहीं।

प्रदर्शन करना है तो अनुशासन भी जरूरी है

प्रदर्शन लोकतंत्र की जान है। सरकार के खिलाफ आवाज उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन सत्ता को जनता की नाराजगी और असहमति का संदेश देता है।

लेकिन प्रदर्शन का तरीका आंदोलन की विश्वसनीयता भी तय करता है।

भारतीय किसान यूनियन के आंदोलनों में ‘जेल भरो आंदोलन’ का नारा लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है। इसका मूल विचार यह था कि आंदोलनकारी कानून तोड़ने के परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहें।

यदि कोई आंदोलनकारी जानबूझकर गिरफ्तारी देता है और शांतिपूर्वक पुलिस के साथ जाता है, तो संघर्ष का केंद्र पुलिसकर्मी नहीं बल्कि वह कानून या नीति बन जाती है जिसका विरोध किया जा रहा है।

यही अहिंसक आंदोलन की ताकत है। पुलिस को धक्का देकर, उससे उलझकर या उसे अपमानित करके आंदोलन का संदेश मजबूत नहीं होता। इसके बजाय शांतिपूर्वक गिरफ्तारी देकर भी सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया जा सकता है।

विरोध सरकार से हो, वर्दी से नहीं

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार से सवाल करना जरूरी है। चुनाव आयोग से सवाल करना जरूरी है। मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप है तो उसका जवाब मांगना भी जरूरी है।

लेकिन विरोध के दौरान यह अंतर बनाए रखना होगा कि राजनीतिक निर्णय कौन लेता है और सड़क पर आदेश लागू कौन करता है।

पुलिसकर्मी किसी आंदोलन का राजनीतिक विरोधी नहीं है। वह अपनी ड्यूटी कर रहा है। अगर उसकी कार्रवाई गलत है तो उसके खिलाफ शिकायत और कानूनी प्रक्रिया का रास्ता खुला है।

इसी तरह यदि सरकार की कोई नीति गलत है तो उसके खिलाफ राजनीतिक आंदोलन और जनदबाव बनाया जा सकता है। यदि किसी संवैधानिक संस्था के फैसले पर सवाल है तो अदालत और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।

अंत में सवाल यही है—जाएगा कौन और रहेगा क्या?

राजनीतिक सत्ता स्थायी नहीं होती। सरकारें आती हैं और जाती हैं। राजनीतिक नेता बदलते हैं। संस्थाओं के पदाधिकारी भी बदलते हैं।

लेकिन देश रहता है।

संविधान रहता है।

लोकतांत्रिक संस्थाएं रहती हैं।

आने वाली पीढ़ियां रहती हैं।

इसलिए आज संविधान बचाने की बात करने वाले हर व्यक्ति को यह भी याद रखना चाहिए कि संविधान केवल अधिकारों की किताब नहीं है। यह अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां और संस्थागत मर्यादाएं भी तय करता है।

यदि लोकतंत्र को बचाना है तो विरोध कीजिए। सरकार से सवाल कीजिए। चुनाव आयोग से जवाब मांगिए। मतदाता सूची पर सवाल उठाइए। लेकिन यह सब संविधान के दायरे में रहकर कीजिए।

गांधी का नाम लेना है तो सत्य और अहिंसा को भी याद रखिए। अंबेडकर का नाम लेना है तो संविधान की संस्थागत मर्यादा को भी समझिए।

आखिरकार राजनीतिक लोग आएंगे और जाएंगे, सरकारें बदलेंगी, पदाधिकारी बदलेंगे। लेकिन जो बचना चाहिए, वह है भारत का संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिकों के अधिकारों की गरिमा।

संविधान की रक्षा का सबसे मजबूत तरीका यही है कि उसकी लड़ाई भी संविधान के रास्ते पर रहकर लड़ी जाए।