वाराणसी, 11 अगस्त : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में सोमवार को “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन : वैश्विक परिप्रेक्ष्य एवं समकालीन प्रासंगिकता” विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ।
पं. दीनदयाल उपाध्याय पीठ द्वारा विश्वविद्यालय के प्रायोजित अनुसंधान एवं औद्योगिक परामर्श प्रकोष्ठ (एसआरआईसीसी) के सहयोग से आयोजित इस सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा तथा पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देना है।
कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता को समझने के लिए भारत की ऐतिहासिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का गहन अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने अकादमिक कार्यक्रमों को अधिक विषय-केंद्रित और सारगर्भित बनाने पर बल दिया।
विशिष्ट अतिथि एवं राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (नई दिल्ली) के कुलाधिपति प्रो. आर.एस. दुबे ने भारतीय दर्शन में धर्म, कर्तव्य, नैतिकता, पर्यावरणीय संतुलन और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा को वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए प्रासंगिक बताया।
मुख्य वक्ता एवं जेएनयू की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा विविधता, बौद्धिक बहुलता और आलोचनात्मक चिंतन पर आधारित है। उन्होंने भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को मानवीय चिंतन का विकल्प नहीं बनने देने की आवश्यकता पर बल दिया।
मुख्य अतिथि मिथिलेशनंदिनी शरण जी महाराज ने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद भारतीय दर्शन की जीवंत अभिव्यक्ति है और विकास को प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण बनाए रखना समय की आवश्यकता है।
सम्मेलन में विभिन्न देशों से आए विद्वान भारतीय ज्ञान परंपरा और पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन के समकालीन आयामों पर तीन दिनों तक विचार-विमर्श करेंगे।
बीएचयू में भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू














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