7 अक्टूबर 2026 | Baghpat Wire

मेरठ। उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाला एक मामला सामने आया है। मेरठ में 2025 बैच के दो सिपाहियों पर आरोप है कि पहली पोस्टिंग मिलने के महज करीब पांच महीने बाद ही वे एक हिस्ट्रीशीटर के लिए काम करने लगे। आरोप है कि दोनों सिपाही हिस्ट्रीशीटर साजिद पिस्टल के साथ मिलकर वारदातों में शामिल थे और इसके बदले उन्हें पैसे मिलते थे। मामला तब खुला, जब दोनों ने कथित तौर पर नकली नोटों के नाम पर एक व्यापारी को ठगने की योजना बनाई, लेकिन व्यापारी ने 112 पर कॉल कर पूरा खेल पुलिस के सामने रख दिया।

तीन वारदातों में 8-8 हजार रुपये लेने का आरोप

जानकारी के मुताबिक, मेरठ में 2025 बैच के सिपाही आशीष और प्रसन्नचित्त आनंद ने मई 2026 में पहली पोस्टिंग हासिल की थी। थाने में तैनाती के बाद दोनों पर आरोप है कि वे हिस्ट्रीशीटर साजिद पिस्टल के संपर्क में आ गए और उसके लिए काम करने लगे।

आरोप है कि इलाके में हर वारदात के बदले साजिद दोनों सिपाहियों को 8-8 हजार रुपये देता था। तीन वारदातों में दोनों द्वारा 8-8 हजार रुपये लेने की बात सामने आई है। इसके बाद दोनों ने कथित तौर पर बड़े स्तर पर पैसा कमाने और कार खरीदने का सपना देखा। इसी सोच के तहत एक बड़े खेल की योजना बनाई गई।

50 हजार के बदले डेढ़ लाख के नकली नोट देने की डील

कथित योजना में साजिद पिस्टल के साथ नकली नोट चलाने वाले गैंग को शामिल किया गया। एक व्यापारी इरशाद के साथ 50 हजार रुपये के बदले डेढ़ लाख रुपये के नकली नोट देने की डील तय होने की बात सामने आई।

हालांकि, पूरा मामला असल में व्यापारी को ठगने के लिए तैयार किया गया ट्रैप था। योजना के तहत साजिद ने पहले इरशाद को नकली नोट बताकर 500-500 रुपये के असली नोट दिए। व्यापारी ने उन नोटों को नकली समझकर बाजार में चलाया। नोट असली होने के कारण आसानी से चल गए। इससे इरशाद का साजिद पर विश्वास जम गया।

इसके बाद कथित तौर पर साजिद और उसके दो साथी व्यापारी के पास डेढ़ लाख रुपये कीमत की 37 गड्डियां लेकर पहुंचे। इन गड्डियों में ऊपर और नीचे असली नोट लगाए गए थे, जबकि बीच में कागज के टुकड़े रखे गए थे।

गड्डियां हाथ में आते ही सिपाहियों ने मारा छापा

योजना के मुताबिक, जैसे ही व्यापारी के हाथ में गड्डियां पहुंचीं, दोनों सिपाही वहां पहुंच गए और छापा मारने की कार्रवाई शुरू कर दी। गड्डियां देने पहुंचे दो बदमाश मौके से भाग गए, जबकि साजिद पिस्टल पकड़ा गया।

आरोप है कि दोनों सिपाहियों ने साजिद को बाइक पर बैठाया और वहां से ले जाने लगे। योजना के मुताबिक यह पूरी कार्रवाई एक पुलिस गुडवर्क के तौर पर दिखाई जानी थी। लेकिन इसी दौरान व्यापारी इरशाद ने कथित तौर पर पूरे खेल को पलट दिया।

व्यापारी ने 112 पर कॉल कर बताया पूरा मामला

इरशाद ने 112 नंबर पर कॉल करके पूरी घटना की जानकारी पुलिस को दी। सूचना मिलते ही 112 की टीम मौके पर पहुंची और दोनों सिपाहियों का पीछा किया। इसके बाद दोनों सिपाहियों को साजिद के साथ थाने लाया गया।

बताया गया कि दोनों सिपाहियों ने थाने में दावा किया कि उन्होंने नकली नोट चलाने वाले गैंग को पकड़ा है। लेकिन इसके बाद एक मोबाइल फोन ने पूरे मामले की परतें खोल दीं।

फैजान के मोबाइल से खुला बड़ा राज

मौके से भागे आरोपी फैजान का मोबाइल फोन साजिद के पास था। थाने में एक कांस्टेबल ने उस मोबाइल को अपने पास रखा हुआ था। इसी दौरान सिपाही प्रसन्नचित्त ने कथित तौर पर उसी फोन पर कॉल कर फैजान से कहा कि गांव से भाग जाओ, पुलिस पीछे लगी है।

कांस्टेबल ने जब मोबाइल नंबर की जांच की तो कॉल करने वाला नंबर सिपाही प्रसन्नचित्त का निकला। इसके बाद पुलिस को कथित साजिश में दोनों सिपाहियों की भूमिका पर शक हुआ और पूरा मामला सामने आ गया।

बदमाशों के साथ सिपाही भी गिरफ्तार, दोनों सस्पेंड

मामला सामने आने के बाद दोनों सिपाहियों को भी केस में नामजद किया गया। इसके बाद उन्हें कथित तौर पर बदमाशों के साथ गिरफ्तार किया गया है। दोनों सिपाहियों को सस्पेंड किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जिन पुलिसकर्मियों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी होती है, उन्हीं पर एक हिस्ट्रीशीटर के साथ मिलकर कथित तौर पर ठगी और अपराध में सहयोग करने के आरोप लगे हैं।

पुलिस की छवि पर उठे सवाल

सिपाहियों की कथित भूमिका सामने आने के बाद पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस योजना को कथित तौर पर पुलिस की कार्रवाई और गुडवर्क के रूप में पेश करने की तैयारी थी, वह एक व्यापारी की सतर्कता और 112 पर की गई कॉल के बाद पूरी तरह उलट गई।

सिपाहियों की हरकत से अफसरों के शर्मसार होने की स्थिति भी सामने आई है। यही वजह बताई जा रही है कि अपराधियों के साथ सिपाहियों के फोटो और वीडियो तक जारी नहीं किए गए हैं।

पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पुलिस की वर्दी पहनने वाले कुछ कर्मचारियों की अपराधियों से कथित मिलीभगत पर समय रहते निगरानी कैसे नहीं हो सकी। पांच महीने की नौकरी के दौरान कथित तौर पर तीन वारदातों में पैसे लेने से लेकर नकली नोटों के नाम पर व्यापारी को ठगने की योजना तक पहुंचने का यह मामला पुलिस विभाग के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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