फिल्म समीक्षा | प्रकाशन तिथि: 03-10-26

अजय देवगन स्टारर ‘Drishyam: The Conclusion’ में एक बार फिर विजय सालगांवकर कानून से दो कदम आगे चलने की कोशिश करता दिखाई देता है। पिछले 11 वर्षों से अपने परिवार को बचाने के लिए लगातार नए-नए रास्ते तलाश रहा विजय इस बार भी पूरी तरह तैयार है। लेकिन कहानी में नई चुनौती बनकर सामने आते हैं क्राइम ब्रांच अधिकारी राजवीर सिंह तोमर, जिसका किरदार जयदीप अहलावत ने निभाया है। फिल्म एक मजबूत क्लाइमैक्स और कुछ अप्रत्याशित मोड़ों के सहारे अपनी कहानी को समेटने की कोशिश करती है, लेकिन धीमी रफ्तार और भावनात्मक गहराई की कमी इसके प्रभाव को कमजोर करती है।

विजय सालगांवकर का दिमाग पिछले एक दशक से लगातार काम कर रहा है। कानून की अगली चाल का अंदाजा लगाकर उससे पहले अपनी रणनीति तैयार करना अब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। उसके सिर पर मंडराती तलवार कभी भी उसके परिवार की जिंदगी को तबाह कर सकती है। इसके बावजूद सालगांवकर परिवार एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ता। परिवार के लिए यह तनावपूर्ण जिंदगी सामान्य हो चुकी है।

फिल्म में यह तनाव एक ऐसे परिवार को दिखाता है जो बीते 11 वर्षों से एक पुराने रहस्य के साये में जी रहा है। समीर ‘सैम’ देशमुख की मौत का मामला अब भी पूरी कहानी के केंद्र में बना हुआ है। इसी अनसुलझे रहस्य की छाया तीसरे और अंतिम अध्याय तक पहुंचती है।

रीमेक से आगे बढ़ने की कोशिश

‘Drishyam’ फ्रेंचाइजी की शुरुआती दो फिल्में जिथू जोसेफ की चर्चित मलयालम ‘Drishyam’ सीरीज से सीधे प्रेरित रही हैं। कहानी का परिवेश केरल से गोवा में स्थानांतरित किया गया और एक साधारण परिवार के मुखिया की उस असाधारण क्षमता को केंद्र में रखा गया, जिसमें वह फिल्मों से मिली अपनी कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल कर अपराध के बाद कानून से बचने के लिए अलिबाई तैयार करता है।

विजय सालगांवकर का किरदार इसी सोच पर आगे बढ़ता है। वह परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए फिल्मों से सीखे तरीकों और अपनी सूझबूझ का सहारा लेता है। फिल्म में यह भी सवाल उठता है कि समीर देशमुख वास्तव में किस तरह का व्यक्ति था और अगर वह जिंदा रहता तो उसके व्यवहार को लेकर कानून क्या करता। हालांकि कहानी इस पहलू की पड़ताल करने के बजाय उसके खिलाफ हुई कार्रवाई और उसके परिवार की न्याय पाने की कोशिश पर अधिक ध्यान देती है।

राजवीर सिंह तोमर की नई चुनौती

इस बार विजय के सामने क्राइम ब्रांच के अधिकारी राजवीर सिंह तोमर के रूप में जयदीप अहलावत हैं। तोमर विजय को गिरफ्तार करने के लिए पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरता है। उसके साथ गैटोंडे भी है, जिसका किरदार कमलेश सावंत ने निभाया है और जो फिल्म में हास्य का महत्वपूर्ण हिस्सा जोड़ता है।

विजय के लिए यह चुनौती नई जरूर है, लेकिन वह घबराने वालों में से नहीं है। जैसे-जैसे बारिश से भीगी कहानी आगे बढ़ती है, दर्शकों के सामने छोटे-छोटे संकेत, छिपी हुई धमकियां और कोर्टरूम से जुड़े कई भ्रम पैदा किए जाते हैं। कहानी एक साथ छिपने और तलाशने के खेल के साथ-साथ दिमागी शतरंज का रूप ले लेती है।

फिल्म का बड़ा सवाल यह नहीं रह जाता कि अंत में कौन जीतेगा, बल्कि यह बन जाता है कि अंतिम मोड़ किस तरह सामने आएगा।

और यहीं फिल्म का क्लाइमैक्स प्रभाव पैदा करता है। अंतिम ट्विस्ट कहानी को एक जोरदार निष्कर्ष देने की कोशिश करता है। समस्या यह है कि उस मुकाम तक पहुंचने के लिए दर्शक को काफी धीमी गति सहनी पड़ती है। कई हिस्सों में कहानी आगे बढ़ने के बजाय ठहरी हुई महसूस होती है।

जयदीप अहलावत की मौजूदगी प्रभावी, लेकिन किरदार का अंत कमजोर

जयदीप अहलावत का राजवीर सिंह तोमर किरदार अपनी मौजूदगी और अंदाज से प्रभावित करता है। उनकी संवाद अदायगी और स्क्रीन पर मौजूदगी में वह आत्मविश्वास दिखाई देता है, जिसकी इस तरह के पुलिस अधिकारी के किरदार से उम्मीद की जाती है।

खास तौर पर चाय के दौरान आतंक पैदा करने वाला दृश्य उनके किरदार की शैली और व्यक्तित्व को प्रभावी ढंग से सामने लाता है। हालांकि इतनी मजबूत शुरुआत के बाद किरदार जिस दिशा में जाता है, वह निराश करता है। जिस प्रभावशाली अंदाज में तोमर को स्थापित किया जाता है, उसका अंतिम असर उतना मजबूत नहीं रह जाता।

फिल्म में तब्बू और रजत कपूर भी समीर के माता-पिता की भूमिका में दिखाई देते हैं। उनके किरदार बेटे से जुड़े सदमे और न्याय की तलाश से प्रभावित हैं, लेकिन कहानी में वे अपेक्षाकृत किनारे पर चले जाते हैं।

विजय और उसके परिवार में भावनात्मक बदलाव की कमी

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या विजय सालगांवकर और उसके परिवार के भावनात्मक विकास से जुड़ी नजर आती है। 11 साल के लगातार तनाव और एक ही रहस्य के बोझ के बावजूद विजय, उसकी पत्नी नंदिनी और बेटियां अंजू और अनु उस भावनात्मक यात्रा से नहीं गुजरते, जिसकी उम्मीद की जा सकती थी।

कहानी विजय के मानसिक और पारिवारिक दबाव को विस्तार से तलाशने के बजाय दर्शकों को उसकी जीत और कानून को मात देने वाले दिमाग पर अधिक केंद्रित रखती है। यही वजह है कि किरदारों में वह गहराई नहीं आ पाती, जो कहानी को अधिक प्रभावशाली बना सकती थी।

फिल्म का एक उद्देश्य अपने ऊपर लगे रीमेक के टैग से आगे निकलना भी दिखाई देता है। गोवा की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को कहानी में अधिक इस्तेमाल करने की कोशिश की गई है। यह बदलाव फिल्म को अपनी अलग पहचान देने का प्रयास है।

अंतिम फैसला

‘Drishyam: The Conclusion’ विजय सालगांवकर की कहानी को समाप्त करने की कोशिश करती है। फिल्म में बड़े ट्विस्ट हैं, कहानी के भीतर दिमागी खेल है और जयदीप अहलावत का प्रभावशाली प्रदर्शन भी है। लेकिन धीमी रफ्तार, सीमित भावनात्मक गहराई और मुख्य किरदारों के विकास की कमी इसे पूरी तरह प्रभावशाली अनुभव बनने से रोकती है।

अजय देवगन का विजय सालगांवकर वाला अंदाज अब भी गंभीर और शांत है, हालांकि कई जगह उनका भावहीन अभिनय नीरसता की सीमा तक पहुंचता महसूस होता है। परिवार के बीच भी लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बावजूद वह सहज घरेलू जुड़ाव दिखाई नहीं देता, जो इन किरदारों को अधिक वास्तविक बना सके।

फिर भी फिल्म का अंतिम निष्कर्ष इस लंबे सफर को विराम देने का प्रयास करता है। विजय सालगांवकर और उसके परिवार के लिए 11 वर्षों से चला आ रहा तनाव आखिरकार एक निर्णायक मोड़ तक पहुंचता है। कहानी के सभी सवालों का भावनात्मक जवाब भले ही पूरी तरह न मिले, लेकिन फ्रेंचाइजी के इस अंतिम अध्याय में कम से कम यह एहसास जरूर आता है कि अब इस लगातार चल रहे तनाव को समाप्त करने का समय आ गया है।

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